बबासीर डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0 एच0 एम0 एस0,एम0डी)
बबासीर
बबासीर दो प्रकार की होती है खूनी एंव बादी होम्योपैथिक चिकित्सा एक लक्षण विधान चिकित्सा है अत: लक्षणों के अनुसार ही औषधियों का चयन किया जाता है
1- वादी बबासीर ,
चुभन हो (एस्कूलस हिप) :- रक्त का शिराओं में एक जगह संचय हो जाने पर उत्पन्न बादी
बबासीर में यह दवा अधिक उपयोगी है, परन्तु ऐसा नही है कि यह दवा खूनी बबासीर में
कार्य नही करती, इस दवा का प्रभाव शिराओं पर अधिक होता है, इसी लिये यह दवा वादी
बबासीर में दी जाती है ,इसमें गुदा में तिनके चुभने का अनुभव होता है, एस्कुलस
में कब्ज कोलिनसोनिया की तरह नही होता । । दवा का उपयोग आवश्यकतानुसार 30 या 200
मे या उच्च शक्ति में भी किया जा सकता है ।
2-खूनी बबासीर चुभन (कोलिनसोनिया) :- खूनी बबासीर में
कोलिनसोनिया उत्कृष्ठ दवा है ,इस दवा में भी रोगी को ऐसा अनुभव होता है जैसे
गुदा में तिनके चुभ रहे हो परन्तु जहॉ ऐस्कुलस वादी बबासीर की दवा है वही यह
खूनी बबासीर की दवा है इसमें रोगी को कब्ज बहुत रहता है ।
कोलिनसोनिया से लाभ
होने के बाद कुछ शेष रह जाये तो एस्कुलस देने से उसे पूर्ण आराम मिल जाता है ।
दवा का उपयोग आवश्यकतानुसार 30 या 200 मे या उच्च शक्ति में भी किया जा सकता है
।
3-मस्से नीले रंग
के अतिसंवेदना (म्यूरेटिक ऐसिड) :- इसमें मस्से नीले रंग के होते है एंव
उसमें अति संवेदनशीलता होती है स्पर्श सहन नही होता गर्म पानी से धोने पर आराम
मिलता है डॉ0 गुऐरसी के कथनानुसार म्यूरेटिक ऐसीड बबासीर की प्रधान दबाओं
में से एक है ।
4-बाहरी मस्से में
उपयोगी (लूफा विण्डाल) :-लूफा विण्डाल इसे संस्कृत में देवदाली कहते है यह बबासीर
अर्थात अर्स रोग में इस का प्रयोग बाहरी मस्सों में लगाने के लिये किया जाता है
मस्सों की अवस्था के अनुसार इसके मूल अर्क की पॉच से दस बूंद एक ओंस पानी में
मिलाकर साफ कपडे या रूई में भिगा कर मस्सों पर लगाने के लाभ होता है । आप चाहे तो
इस दवा का मूल अर्क को पेट्रोलियम जैली वेसलिन मे मिला कर मलहम की तरह से प्रयोग
कर सकते है । इसका महलम बनाने के लिये बजार में मिलने वाले पेट्रोलियम जैली वेसलीन
जिसमें किसी प्रकार के सेन्ट या खुशबू नही होना चाहिये अर्थत प्लेन वेसलीन का ही
प्रयोग करे इसमें उपरोक्त बतलाई दबा को इतना मिलाये जिससे वेसलीन का रंग मदर
टिंचर के रंग की तरह हो जाये बस आप के अर्स की दबा तैयार है अब इसे अपनी
सुविधानुसार दिन में दो तीन बार अवश्य लगा ।
5 -गुदा प्रदेश का
चटखना या फट जाना (नाईट्रिक ऐसिट) :- नाईट्रिक ऐसिड का मुख्य लक्षण
है शरीर के नाजुक त्वचा का फटना जैसे मुंह गुदा मार्ग आदि । बबासीर की अवस्था
में जब गुदा प्रदेश फट जाते है इससे रोगी को अत्यन्त र्दद व तकलीफे होती है इस
अवस्था में मस्से बाहर निकल आते है ऐसी अवस्था में नाईट्रिक ऐसिट दबा का प्रयोग
किया जाना चाहिये ।
6 -रक्त संचय (कैक्टस) :-
रक्त संचय के कारण जब कभी बबासीर के मस्सों में रक्त भर कर बडे हो जाते है इन
लक्षणों में खूनी बबासीर में इस दबा का प्रयोग किया जा सकता है ।
7-बादी बबासीर में
कब्ज रहने पर (नक्स, सल्फर) :- बादी बबासीर में जब
लेट्रींग कडी हो या कब्ज हो तो ऐसी स्थिति में दिन में सल्फर 30 तथा रात्री में
नक्स वोमिका 30 पोटेंसी में देना चाहिये इससे कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है एंव
लेट्रीग का कडापन खत्म हो जाता है इससे गुदा द्वारा में होने वाली परेशानी एंव
मस्सों के छिलने से जो परेशानीयॉ होती है उससे राहत मिल जाती है ।
8-भगन्दर (रैटानहिया) :- भगन्दर,
मलद्वार के फटे धॉव एंव दर्द आदि में इस दबा का प्रयोग किया जाता है । आवश्यकतानुसार
30 या उच्च शक्ति में इसका प्रयोग किया जा सकता है ।
9-बबासीर के मस्सों
में धॉव होने पर (कैलेन्डुला ):- बबासीर के मस्सों के कट जाने या किसी भी
कारण से धॉव होने पर कैलेन्डुला क्यू मूल अर्क में इसे पेट्रोलियम जैली में इतना
मिलाये कि उसका रंग मिलाई जाने वाली दवा की तरह से हो जाये अब इसे मस्सों के
धॉवों पर अपनी सुविधानुसार लगा सकते है कैन्थरीज एक होम्योपैथीक की ऐन्टी सेप्टीक
दवा है एंव इससे धॉव आदि में इनफेकशन होने का खतरा नही होता एंव धॉव जल्दी भर
जाते है ।
डॉ0 सत्यम सिंह चन्देल (बी0 एच0 एम0
एस0,एम0डी)
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